शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

उँगलियों पर छाले!

मुझे दुहाई मत दो
उन रिश्तों की
जिन्हें ज़माने ने
अपना औ' सबसे अपना कहा है,
उनके दिए ज़ख्म
पैबस्त हैं सीने में,
गिनने बैठ जाऊं
तो
उँगलियों में छाले पड़ जायेंगे.
इससे बेहतर है,
उन्हें दफन ही रहने दो
जो खुशियाँ गैरों से
मिल रही हैं.
मुझे उनमें ही जीने दो.
सिर्फ प्रेम की नीव पर खड़े
इन रिश्तों में
कहीं स्वार्थ और अपेक्षा
नहीं होती,
नहीं दुखते हैं दिल कभी
औरों से मिले
दुःख दर्द बाँट लेते हैं.
तभी तो ये दुनियाँ
टिकी है इस दौर में भी,
नहीं तो
दुनियाँ मायूसों से भरी होती.

16 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

मुझे दुहाई मत दो
उन रिश्तों की
जिन्हें ज़माने ने
अपना औ' सबसे अपना कहा है,
उनके दिए ज़ख्म
पैबस्त हैं सीने में,
गिनने बैठ जाऊं
तो
उँगलियों में छाले पड़ जायेंगे....

aur mujhe pata hai koi marham nahi lagata, balki uspe namak chhidak jata hai

ashish ने कहा…

सुन्दर भाव प्रवण रचना , अपनों के दिए जख्म पर सचमुच कोई मलहम प्रभावी नहीं होता है .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी रचना बहुत सुन्दर लगी!

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत रोचक और सुन्दर अंदाज में लिखी गई रचना .....आभार

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Bahut khoob ... apno ke jakhm bharna aasaan nahi hota ...
Achhee rachna hai ..

शोभना चौरे ने कहा…

बिकुल यथार्थ बया करती सुन्दर अभिव्यक्ति |

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यह रचना पढ़ कर मुँह से बस आह निकली...मन के छाले उँगलियों पर ....बहुत सटीक बात

Udan Tashtari ने कहा…

बिल्कुल सही कहा..


एक उम्दा रचना!

निर्मला कपिला ने कहा…

मुझे दुहाई मत दो
उन रिश्तों की
जिन्हें ज़माने ने
अपना औ' सबसे अपना कहा है,
उनके दिए ज़ख्म
पैबस्त हैं सीने में,
गिनने बैठ जाऊं
तो
उँगलियों में छाले पड़ जायेंगे....
मरहम लगाता भी कौन है बस नमक छिडकते हैं। बहुत अच्छी लगी रचना शुभकामनायें।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मंगलवार २० जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

धन्यवाद संगीता कि तुमने मेरी कविता को चर्चा के लिए चुना.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

सच में रिश्ते स्वार्थ की पोटली भर रह गए हैं.

सुंदर सशक्त रचना.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत भावपूर्ण रचना...बधाई..

नीरज

nilesh mathur ने कहा…

गिनने बैठ जाऊं
तो
उँगलियों में छाले पड़ जायेंगे....
बहुत सुन्दर और संवेदनशील रचना है, बेहतरीन!
देर से आने के लिए माफ़ी, कई दिनों से टूर पर था!

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

भरी भी और हरी हरी है दुनिया।

सत्यम शिवम ने कहा…

बहुत अच्छा....मेरा ब्लागः"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com .........साथ ही मेरी कविता "हिन्दी साहित्य मंच" पर भी.......आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे...धन्यवाद