शनिवार, 10 जुलाई 2010

ये बलात स्वयंभू!

आवाज की गरजती ध्वनि
गूँज जाती है
घर - आँगन में,
सहम जाते हैं
जीव जंतु ही नहीं
मानव कहलाने वाले
वे सभी लोग
जो लघु की सीमा में बंधे हैं.
किन्तु
ये गरज बयान करती है
अपनी कहानी खुद ही
साथ ही तुम्हारा मनोविज्ञान भी
कहीं कोई कुंठा
सर्वोच्च होने का अहसास
बार बार विवश करता है
अपनी विशालता की मुहर पर
स्याही लगाने के लिए
गरजते तुम
पर अपने अन्दर दबी
किसी हीनता से ग्रसित होकर
चीखते हो
कि मैं सर्वोच्च हूँ.
किन्तु भय से / दौलत से
सम्मान खरीदा  नहीं जाता
प्यार बटोरा नहीं जाता.
ये स्वयंभू होने के अहंकार
तुम्हें और नीचे गिरा देता है.
कोरे अहंकार से ग्रसित
अभिशप्त है तुम्हारा जीवन
और ग्रहण हो तुम
औरों के लिए
ग्रस रखा है तुमने
उनकी खुशियों, हंसी और सुख चैन को
कब मुक्त होगे?
कब सब लेंगे सुकून की एक सांस.
कब सब जियेंगे सुकून से
भय मुक्त जीवन.

1 टिप्पणी:

संजय भास्कर ने कहा…

ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.