सोमवार, 26 जुलाई 2010

घर के चिराग !

एक एक करके
चिराग घरों के
गुल क्यों हो रहे हैं?

कभी इस घर में रुदन,
कभी उस घर में चीत्कार
क्या मातम
इसी तरह से
रोज पसरता  ही रहेगा.

एक दिन
सारे चिराग गुल होकर
अँधेरे में डूबा
ये गुलिश्तां
श्मशान  ही बन जाएगा.
और इन बेसहारों का जीवन
घिसटेगा बिना बैसाखियों के
अरे कुछ तो करो
रोको इन पागलों को
जो इंसां की पौध 
बेपनाह रौंदते जा रहे हैं.  

4 टिप्‍पणियां:

shikha varshney ने कहा…

कौन रोकेगा इन्हें? मार्मिक अभिव्यक्ति.

rashmi ravija ने कहा…

ओह मन द्रवित हो गया...बहुत ही मार्मिक रचना..

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही मार्मिक

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..