शनिवार, 29 मई 2010

ये हादसों की इमारत !

ये जिन्दगी
हादसों की इमारत है,
जिसकी एक एक ईंट के  तले दबे
इस जिन्दगी के
कुछ न भूलने वाले 
हादसे ही तो हैं.
इसको आकार देने में
कभी मन से
कभी बेमन से
दायित्वों को ओढ़े 
ख़ामोशी से
यंत्रवत सक्रिय
ये हाथ और पैर चलते रहे .
मष्तिष्क और ह्रदय 
मेरी धरोहर थे ,
जो अपनी वेदनाओं से
कोरे कागजों को रंगते रहे.
ये ही मेरी शक्ति है,
ज्वालामुखी -
जो धधक रही है,
विस्फोट न हो
सर्वनाश न हो
इसीलिए तो
ये छंद रच रहे  हैं.
तमाम आक्रोश, विवशताओं की देन 
आंसुओं का जहर 
कहीं मुझे ही न मार दे
बस इसी लिए 
ये जो सृजन  है
वह आक्रोश औ' विवशता को
नए पंख दे देता है
और मन 
हल्का  होकर
फिर उड़ान भरने के लगता है. 


6 टिप्‍पणियां:

sangeeta swarup ने कहा…

सटीक....शब्द सृजन ही वेदनाओं को कम करने में सहायक होता है....और ये गरल पी कर भी इंसान जूझता रहता है....अच्छी अभिव्यक्ति

nilesh mathur ने कहा…

आपका सृजन सार्थक है, बहुत ही सुन्दर रचना!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सृजन
आक्रोश औ' विवशता को
नए पंख दे देता है... bilkul sahi

nadeem ने कहा…

आंसुओं का जहर
कहीं मुझे ही न मार दे

सुंदर रचना

उम्मेद गोठवाल ने कहा…

आक्रोश और विवशता को सृजन नये पंख दे देता है...बहुत मौलिक और सुन्दर विचार....सशक्त व सार्थक लेखन के लिए बधाई।

rashmi ravija ने कहा…

तमाम आक्रोश, विवशताओं की देन
आंसुओं का जहर
कहीं मुझे ही न मार दे
बस इसी लिए
ये जो सृजन है
शत प्रतिशत सहमत....
सटीक अभिव्यक्ति