शुक्रवार, 19 जून 2015

वजन रिश्तों का !

आज निकले
मन की तराजू लेकर
तौलने वजन रिश्तों का ।
हमने तो जीवन भर
दिया सबको
अंतर मन से वांछित ,
पर शाम तक
लौटने के समय तक
कोई मुझे वक्त ही न दे पाया
तौलती मैं क्या ?
सजे हुए घर
मेज पर लगे नाश्ते की प्लेटें
या हाथ बांधे खडी
उनके कामगरों की फौज ।
खाली तराजू ,
भरा मन औ'
रिक्तता का अहसास
लेकर वापस आ गयी।

3 टिप्‍पणियां:

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

as usual ...........shandaar !!

प्रभात ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति!

महेश कुशवंश ने कहा…

सुंदर लिखा