शनिवार, 9 मई 2015

हाइकू !

माँ  मेरी तुम
ममता का आँचल 
छाँव घनी हो। 
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लोरी तुम्हारी 
पीड़ा हरे हमारी 
आये निंदियां. 
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तुमने छोड़ा 
अनाथ हुए हम 
पीड़ा भरी है। 
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कभी तो आओ 
सपने में ही सही 
प्यार करने। 
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3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-05-2015) को "सिर्फ माँ ही...." {चर्चा अंक - 1971} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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Onkar ने कहा…

भावपूर्ण हाइकु

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर और प्रभावी हाइकु...