गुरुवार, 2 जून 2011

आभार करो !

विनम्र हो इतना
कि जिसमें शेष रहे
आत्मसम्मान तुम्हारा
दीनता का भाव धरो,
झुको इतना कि
गरिमा तुम्हारी बनी रहे,
गर वे करें कोशिश
बिछाने की
टूटने की दशा में
मान लो वे इस काबिल नहीं
भाषा उन्हें
समझ आती है अपशब्दों की
अपशब्द सीखो नहीं
बस उस रास्ते को छोड़ दो
मानव की कई श्रेणियां होती हैं
तुम जहाँ हो
वहीं से चल पड़ो
वे रास्ते कहीं जाते नहीं
पतन के आगे
कोई रास्ता होता नहीं,
गर्त में गिरो तो
कोई थाह होती नहीं
मन क्रम वचन से
धीर धर कर
तुम आचरण करो
आगे देखो पीछे
अपने रास्ते तुम खुद चुनो
मंजिल तुम्हें मिल जाएगी,
इस पथ का राही कभी
भटक कर विचलित होता नहीं
कुछ मिले मिले
हर लेकर द्वार पर
संतोष खड़ा मिलेगा
मूँद कर आँखें स्वीकार करो
ईश को नमन कर आभार करो

7 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

एक प्रेरक कविता। साकारात्मक सोच के साथ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अच्छा सन्देश देती अच्छी रचना

Rajesh Kumari ने कहा…

achchi prernaa deti hui kavita.

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

di aap sach me ek prerna ka roop ho...hindi ke har vidhha pe gajab ka varchaswa hai aapka..:)

khubsurat rachna....

रश्मि प्रभा... ने कहा…

विनम्र हो इतना
कि जिसमें शेष रहे
आत्मसम्मान तुम्हारा
दीनता का भाव न धरो,
झुको इतना कि
गरिमा तुम्हारी बनी रहे,
aapki rachna sandeshatmak hoti hai

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

सुन्दर कविता, सुन्दर सलाह!

वन्दना ने कहा…

बेहद प्रेरक कविता।