सोमवार, 23 जनवरी 2017

पतंग !

खुले
आसमान में
विहान से उड़ते रहो
पतंग
मत बनना कभी।
वो पतंग
जो
डोर दूसरों को देकर
आसमान में
नचाई जाती है ,
न मर्जी  से उड़ती है
और न मर्जी से उतरती है।
हाँ वह
काट जरूर दी जाती है ,
और बेघर सी
कहीं से कटकर
कहीं और जाकर
जमीं मिलती है उसे।
अपने पैरों को
उन्मुक्त आकाश में
फैलाये हुए
अपने अस्तित्व को
जीवित रखते हुए  
सुदूर आकाश में
बस अपनी मर्जी से
उड़ते रहो
उड़ते रहो।

5 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (24-01-2017) को "होने लगे बबाल" (चर्चा अंक-2584) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की 120वीं जयंती और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर भावपूर्ण!!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

पतंग को उड़ना है तो किसी की डोरी में बंधना ही पड़ेगा.

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बढ़िया