सोमवार, 2 जून 2014

हाइकू !

हाइकू !
माँ बेटों को थी
आँचल में छिपाए
तपती रही।
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रिश्तों का दीप
स्नेह मांगता ही है
जलेगा कैसे?
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उदास मन
खामोश थी कलम
लिखूं तो कैसे ?
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जंग जीतना
आसान नहीं होती
उसूलों की हो।
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1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (03-06-2014) को "बैल बन गया मैं...." (चर्चा मंच 1632) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक