गुरुवार, 28 जून 2012

हाइकू !

बेटी बचाओ 
सृष्टि  बच जायेगी 
अभी वक़्त है।
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भीगा आँचल 
हिलोरती ममता 
हाथ बंधे हैं .
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झुकी पलकें 
शुष्क आँखों की लाली 
वही कहानी। 
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रुदन सुना 
भूख से रोते शिशु 
आहत माँ  है .
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चेत भी जाओ 
वक़्त अभी बाकी  है 
जीना चाहो तो .
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जीवन बीता 
परोपकार में ही 
रीते हाथ हैं।
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आत्मा खुश है 
फटेहाल जीते हैं 
पैमाना क्या हो ?
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प्राण वायु है 
कब तक चलेगी?
 स्रोत चाहिए .
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मंगलवार, 26 जून 2012

हाइकू !

धन संचय
विदेश में ही  होगा
मंत्री जो हैं न
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प्रजातंत्र का
मजाक बना दिया
संसद में भी। .
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देश के हित
संसद में निहित
बेचे गए है .
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यहाँ कमाओ
विदेश  में  ले जाओ
देशभक्त हो।
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शोर   थमा है
 कल चुनाव होगा
दिल थाम लो।
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 ताकत  नापो
 सियासत के  लिए
चमचे गिनो।
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दरवाजे पे
पोस्टर चिपके  है
कैसे ठग है?
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रविवार, 10 जून 2012

नम आखों के प्रश्न !

औरत  की आखों को
 कभी झील कहा  उनको,
कभी सागर की गहराई नापी 
नील गगन  की विशालता से
उनको परिभाषित किया गया,
अनुसुइया सी ममता  देखी,
राधा का प्रेम छलका उनमें
सीता सी सादगी से भरी
दुर्गा सी दृढ़ता देखी.
कुछ कवियों की कल्पना थी
कुछ पौराणिक  ग्रंथों की बातें
आज झांके  जब उन आखों में
कुछ रूप हमें ऐसा ही दिखा --

झाँका नम आखों में मैंने
वे एक माँ की आँखें थीं
बरसी थी ममता से भरी वे
अपने सब लालों पर
पर आज
वे नम थी
अपनी ममता के तिरस्कार
औ'
बिखरे सपनों से
उसकी ममता  औ' त्याग
उसका फर्ज करार दिए थे.
बेटे के फर्ज सिर्फ अपने
लालों में सिमटे थे.
फिर भी
दिल में लिए दुआएं
बैठी थी मंदिर के द्वारे पर
बच्चों के हित में डूबी थी.

झाँका नम आखों में
वे एक पत्नी की आँखें थी 
करके समर्पित जीवन अपना 
धारण कर कुछ चिह्न 
बनी थी कन्या से वो नारी 
बदले में जो कुछ पाया 
अपने घर के तानों से वो 
कभी मुक्त न हो पाई 
फिर भी 
तन मन से रही समर्पित 
नम आखें कहती  हैं 
मुझे बता दो कोई 
मेरा अपन अस्तित्व कहाँ हैं?
मैं कौन हूँ?
किसी की बेटी,
बहन किसी की ,
पत्नी हूँ मैं ,
और बहू बनी हूँ .
फिर  माँ बनकर है इति ,
बस इतनी से परिभाषा है 
इसी के साथ जाना है।

झाँका उन नाम आखों में 
वे एक बेटी की आँखें थी।
हाय लड़की हुई !
फिर लड़की !
बड़ा भार  है?
लड़की है दबा कर रखो 
सुना सभी कुछ 
सह न पाई 
उन नम आखों की पीड़ा 
किसने पढ़ी है?
किसने जानी?
पूछ रही वे नम आखें 
आखिर ऐसा क्यों है?
अनचाहे हम क्यों हैं?
हमें हमारे ही लोग 
क्यों नहीं चाहते हो?
होकर भी फिर 
उपेक्षा, तिरस्कार आर बंदिशे ने 
आत्मा की हत्या कर दी,

पूछ रही है वही 
वो कैसी नारी थी?
पूजा था जिसको सबने 
नमन किया था जग ने।
फिर क्यों हम 
रहे अधूरे 
मुकाम अपना खोज रहे हैं 
और मुकाम 
शायद मिल भी जाए 
शायद सब को नहीं  मिलेगा .
नम आखों के 
उठते प्रश्नों को 
उत्तर कौन है देगा?
उत्तर कौन है देगा?
 

बुधवार, 6 जून 2012

नव संकल्प !

म गुलामी के दिनों से ही 
पश्चिम को 
हसरत भरी निगाहों से 
देखते थे
धीरे धीरे 
उसको जीवन में उतारने लगे।
दे दी बच्चों को 
बचपन से ही आज़ादी,
अपने मन से जीने का हक 
लेकिन चूके हम इस जगह 
अधूरी ही शिक्षा दी।
हम खुद भी अधकचरी 
सभ्यता और संस्कृति को लिए 
भटक रहे थे।
उन्हें आत्मनिभर होने का 
पाठ  सिखाना भूल गए।
वे महत्वकांक्षी तो बने 
लेकिन हमारी बैशाखी पर 
और बिना पर उगे ही
 ऊँची उड़ान  का सपना देखने लगे,
उनकी तरह से परिश्रम करना,
आत्मनिभर होने का जज्बा,
और लगन नहीं सिखाई ।
हमने उन्हें आजादी  के साथ 
वो सब दिया जिसकी कीमत 
उन्हें पता ही नहीं थी ।
भटकने लगे वे दिशा 
बेलगाम होकर 
उत्श्रंखल से आचरण 
करने लगे। 
ये दोष उनका नहीं हमारा है,
हमारी परवरिश और संस्कार 
अधूरे रह गए 
और वे जीवन के गलियारों में 
बिना सबब भटक गए।
हमारी नजर में ही 
हमारी संस्कृति की गरिमा 
खो गयी .
हमारी अधकचरी सोच ने
 हमें कहीं का नहीं छोड़ा 
कभी वे नादानी में 
कर बैठे अपराध 
वह जिसका अर्थ भी 
उनको पता नहीं था . 
और हम उन्हें बता न सके 
दोषी वे नहीं है 
दोषी तो हम ही हुए न, 
अब भी समय है 
संभलना हमें  होगा 
खोल कर अपनी थाती 
फिर से सबक लें हम 
अपनी माटी  का मान और महक 
अब भी बचा लें ,
खुद को मुक्त कर लें 
उस पश्चिम  की 
मृग मरीचिका से .
अभी देर नहीं हुई है
खुद पहले लौटे 
सत्य , संयम और सदाचार में 
आने वाले खुद उसमें बध जायेंगे .
फिर से 
राम. कृष्ण , बुद्ध से 
चरित्र इस धरती पर पैदा होंगे।
हम अभी बहुत नहीं भटके हैं 
वापस आने के रास्ते 
अभी बंद नहीं हुए हैं,
कदम पीछे लाकर 
इसी धरती के लिए 
जीने और  जीते रहने का संकल्प करेंगे ।

शनिवार, 2 जून 2012

बादलों से भाव !

पता नहीं क्यों?
हवा में बिखरे
रुई के फाहों से बादल
जेहन में उमड़ते
भावों और शब्दों की तरह
इधर से उधर
उमड़ते घुमड़ते रहते हें.
वह आसमां में
कई टुकड़ों को जोड़कर
क्षण क्षण में
अलग अलग आकृतियाँ
बनाकर फिर बिखर जाते हें.
ठीक वैसे ही
जैसे भावों के अनुरुप
शब्द समूह बनते हें
नहीं ये नहीं
फिर दूसरा संयोजन
नहीं ये नहीं
फिर नए शब्द समूह
सही लगने लगते हें.
पन्नों पर उतार कर
sthayitva  पा लेते हें.
बस यही तो वे
बादलों की आकृति से अलग
क्षणभंगुर नहीं होते.
अपने स्वरूप से
छू जाते हें अंतर को.
कभी कभी
बादलों सा पिघल कर
बादलों से गिरती बूंदों की तरह
भाव आँख में उतर कर
बरस जाते हें.
बस दुःख पी लेने की
ताकत आ जाती है.