मंगलवार, 23 मार्च 2010

सवाल गुरुओं से !

 बहुत साल पहले
जब ये सब नहीं हुआ था,
होता तब भी था ,
किन्तु परदे में छुपा था.
मेरा मन तब भी
इनसे खफा था.
वह प्रवचन दे रहा था
भीड़ से भरे पंडाल में
गुरु की वाणी
ईश्वर का आदेश
तभी मेरा अंतर बोला -
'चाहे रखा हो
बहुरुपये ने वो वेश?'
आत्मा शुद्ध हो
वाणी औ' मन भी 
कभी कटु न बोलो,
ह्रदय किसी का
तुम्हारे वचनों से 
व्यथित न हो.
जो भी अर्जित करो
धर्म, धन या धैर्य
कुछ अंश उसका
औरो पर व्यय करो.
फिर मन बोल उठा -
'पर
जो तुम कमा रहे हो
वहा कहाँ जा रहा है?
साथ में ये 
सुंदरियों का हुजूम
जिन्हें सेविकाएँ कर रहे हो
कौन सी सेवा करती हैं?'
इन प्रश्नों का उत्तर
इस प्रवचन के बीच 
कुछ और भी उठा रहे थे.
आत्मा की शुद्धि की
बात करने वाले 
क्या कभी खुद भी अपनाया है.
ये उपदेश हमें देने के स्थान पर
कभी खुद पर लिए हैं
जानो  अपने अंतर में 
खुद क्या हो?
फल, मेवा, मिष्ठान के
भोग लगाने वाले
क्या त्यागा तुमने?
भोग या योग?'
फिर बोले वे
भोग त्याग कर 
योग की शरण में जाओ,
वही कल्याण हो सकता है,
मुक्ति का वही एक रास्ता है.
रुका नहीं मन
फिर चिहुक उठा -
'अरे बाबा
अपने भोग की बात करो
त्यागा या नहीं
ये हम नहीं साक्ष्य कह रहे हैं.
वे जो तुम्हारी छाया में जी रहे हैं.
कितना प्रसाद पा रहे हैं.
गुरु के दर्शन,
गुरु का सानिंध्य,
गुरु का आशीर्वाद,
कौन ले रहा है?
इस भगवा और श्वेत 
वस्त्रों के पीछे
कितने काम रंगीन हो रहे हैं
ये हम आज नहीं 
कल खोज लेंगे.
इनके पीछे कितने और कैसे
कर्म संगीन हो रहे हैं?' 
अंतर की आवाज चुगली 
कर गयी.
किसी साधक ने सुन लिया
कितने साधक
उस दिन टूट पड़े थे
मुझे लहूलुहान कर दिया
वर्षों गुजर गए
आज सच्चाई खुल रही है
तो उनके और सबके साधक
सिर पीट रहे हैं,
क्या पता हम भी 
इसी तरह से छले  जा रहे हों?
मेरा अंतर न तब 
न अब
मानव से ऊपर किसी मानव को 
स्वीकार नहीं करता .
सिर्फ एक सच्चा मानव ही पूज्य है.
उसके लिए वस्त्रों के बदलने  की
जरूरत नहीं होती,
अपने सद्कर्मों को
दिखाने के लिए पंडालों 
की भीड़ भी नहीं होती.
कर्म खुद बोलते हैं
अपने मुंह से न सही
औरों कि जुबान से बोलते हैं.
जीवन में सिर्फ
एक बार किसी के दुःख बांटों 
बहते हुए आंसुओं को पोंछो 
मेरी नजर में
तुमसा वन्दनीय और पूज्यनीय 
मानव कोई नहीं.
इस लिए सिर्फ 
मानव बनो.  

5 टिप्‍पणियां:

shikha varshney ने कहा…

रेखा जी मेरी तो आजतक समझ में नहीं आया कि इन बाबाओं पर लोग यकीन करते कैसे हैं...इन्हें सामने ढोंग होता हुआ कुछ भी नहीं दीखता क्या? अक्ल पर तो पर्दा डाल देते हैं ये पर क्या आँखों पर भी पट्टी बाँध कर आते हैं.

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

शिखा,

इनमें कुछ हिप्नोतिज़े करने की भी कला होती है, कुछ इंसान के अन्दर का अपना अपराध बोध कि इनकी शरण में जाकर सब कुछ मिलने वाला है या फिर सारे पापों और दुष्कर्मों से मुक्ति मिल जायेगी. उनकी अपनी कोई सोच नहीं होती. अगर उनमें अपने कर्मों को सत्कर्म बनाने का विचार हो तो इनके पीछे भागने का विचार ही न आये.

शोभना चौरे ने कहा…

जीवन में सिर्फएक बार किसी के दुःख बांटों बहते हुए आंसुओं को पोंछो मेरी नजर मेंतुमसा वन्दनीय और पूज्यनीय मानव कोई नहीं.इस लिए सिर्फ मानव बनो.
bilkul sahi kha hai .har manv me ishvar hai fir admbar kyo.?vidmbna dekhiye ihne ttthakthit guruo ke bhanda fod hone par bhi unki dukane dhddle se chal rahi hai.
kuch shikshitlog ashikshito ka shara lekar bhi isme apna yogdan de rhe hai.

rashmi ravija ने कहा…

आपने तो पूरी पोल खोल डाली इन गुरुओं की...बहुत सही कहा है...पता नहीं क्यूँ लोग इन गुरुओं की बातों में आ जाते हैं.और उन्हें भगवान बना डालते हैं.खुद अपने ऊपर क्यूँ नहीं भरोसा करते..बड़ी अच्छी पंक्तियाँ हैं ये..
एक बार किसी के दुःख बांटों
बहते हुए आंसुओं को पोंछो
मेरी नजर में
तुमसा वन्दनीय और पूज्यनीय
मानव कोई नहीं.
इस लिए सिर्फ
मानव बनो.

M VERMA ने कहा…

तुमसा वन्दनीय और पूज्यनीय
मानव कोई नहीं.
इस लिए सिर्फ
मानव बनो.
हम सिर्फ जो मानव बन जाये तो और कुछ की क्या जरूरत