सोमवार, 8 मार्च 2010

महिला दिवस का शतक

एक शतक 
ये भी बना,
क्या सुलझी है सौ गुत्थियाँ भी?
शायद नहीं?
इसको हमने कब जाना?
जानकर भी 
 कभी अपना हक़ ही  माना,
शायद  नहीं?
संकल्प लिए गए,
कर्म से जूझे भी,
कभी गिरे उठे भी,
पर
हम अभी भी
सबको दिशा नहीं दे पाए
उन्हें मुक्त नहीं करा पाए
उन्हें जहाँ मुक्त होना है
बगावत का झंडा नहीं,
उन्हें मानव होने के
अर्थ समझने है.
दायित्वों के बोझ 
सक्षमता से ढोने के
गुर समझने हैं.
खुली हवा में 
सांस लेने की
दशाओं और दिशाओं के
रहस्य  समझने हैं.
विश्व में
अकेले नहीं
बस अपने आस-पास
पैरों तले की जमीन का
अहसास समझना है
महिला दिवस 
कोई जश्न या उत्सव नहीं
समता का विश्वास
अपने मानस  पटल पर
बिठा  लेने के
आभास समझने हैं.
अपने होने के
जीने के
जीवन देने के
और उन जीवन को
एक बेहतर मानव
बनाने की
राह  में
बिछे कंटकों से
बचने के 
रास्ते समझने हैं.

2 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

एकदम सही कहा...बहुत उम्दा रचना.


अंतर राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.

-उड़न तश्तरी

anitakumar ने कहा…

यही सच है, यही सार है महिला दिवस का