शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2020

दीवार !

 दीवारें

खड़ी होती है ,

टूटती रहती हैं,

चाहे जितनी ऊँची क्यों न हो ?

जो बनी है वो नष्ट होगी ।

नाशवान तो मानव भी है ,

फिर भी 

मुट्ठी जैसे दिल में 

अगर खिंच जाती है दीवार तो

उस दिल से भी छोटी दीवार

बिना ईंट गारे के

अभेद्य, अटूट और अक्षुण्य होती है ।

तब दिल, दिमाग और जिस्म भी

शिला हो जाते है ।

किसी कर्म के अभिशाप से ,

यही कटु यथार्थ समझो ।