शनिवार, 11 अप्रैल 2020

कहते हैं सभी कोरोना हूँ !

कहर बन कर आया जरूर हूँ ,
विश्व में भी कहलाया क्रूर हूँ ,
जन्म दिया किसने ये प्रश्न है ?
वही जिन्हें अपने पर गुरूर है।

                               हाँ हर तरफ सबका रोना हूँ।
                               कहते हैं सभी कोरोना हूँ।

प्रकृति के नियमों को तोड़ कर ,
पर्वतों को मशीनों से  जोड़ कर ,
ध्वस्त कर दी रचना  धरा की ,
रख दिया धाराओं को मोड़ कर।

                               हाँ हर तरफ सबका रोना हूँ।
                               कहते हैं सभी कोरोना हूँ।

कुछ दिनों को बंद प्रदूषण की मार ,
शांत हो वातावरण, हो शोर की हार ,
 स्वच्छ हुआ आकाश नील वर्ण का ,
वर्षों बाद देखा है गगन धुंआ के पार।

                               हाँ हर तरफ सबका रोना हूँ।
                               कहते हैं सभी कोरोना हूँ।

मकान बन गए घर गुलजार हो ,
नन्हों को मिल गया ममता प्यार हो ,
चेहरे मुस्कराते हैं सभी के आजकल,
बंदिशें भले हो फिर भी ये बहार हो.

                               हाँ हर तरफ सबका रोना हूँ।
                               कहते हैं सभी कोरोना हूँ।
                                 

6 टिप्‍पणियां:

vandan gupta ने कहा…

वाकई इस कोरोना काल मे सब बुरा ही नहीँ काफी कुछ अच्छा भी हुआ है...सार्थक अभिव्यक्ति

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

वन्दना आभार यहाँ तक आने के लिए ।

विश्वमोहन ने कहा…

सही बात!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

सुन्दर और सामयिक

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

शास्त्री जी जो हमारी ब्लॉगिंग की गति मंद पड़ चुकी है उसको फिर से गतिमान बनाना है । सहयोग एवं सोते हुओं को प्रोत्साहित करने के लिए आपकी टिप्पणी सहायक होगी।

डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) ने कहा…

ये संकट भी चल जाएगा और छोड़ जाएगा अपने पीछे मानवीय मूल्यांकन को