शनिवार, 24 अगस्त 2019

बात मित्रों की !



जब पलटती हूँ 
अतीत के पन्नों को
कुछ लम्हे, कुछ बातें,
जेहन में बसी हैं आज भी ,
कुछ तस्वीरें चस्पा हैं मित्रों की ।

एक उदासी भी
चुरा लेती थी हँसी सबकी, 
नजरें तो लगी होती है चेहरे पर  
उदासी का सबब जानने को
बात कुछ और थी ऐसे  मित्रों की ।

ऐसे ही इस दिन
सारे मुस्कुराते हुए चेहरे  
कहीं भी हों, सामने होते हैं,
कभी वीडियो पर , कभी पन्नों पर
यही तो फितरत होती है मित्रों की ।

हर रिश्ते से बड़ा,
हर दुख सुख में साथ खड़े,
हाथ थाम लेते हैं अपनों से
दुनिया बदले, नहीं बदलती है ,
इस जीवन में फितरत मित्रों की ।

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (26-08-2019) को "ढाल दो साँचे में लोहा है गरम" (चर्चा अंक- 3439) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Nitish Tiwary ने कहा…

बहुत सुंदर कविता।