मंगलवार, 18 जून 2019

आह्वान !

जब जब बढ़े अधर्म धरा पर,
धैर्य धर संयत तो रहना होगा,
मन से स्मरण  कर शक्ति का,
              मन की दुर्बलताओं को हरना होगा।
             तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।

वो शक्ति स्वरूपा दुर्गा हो ,
काली हो या विकराली हो,
चामुण्डा शक्ति बगलामुखी,
            तुम्हें निर्भयता मन में भरना होगा।
             तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।

रावण , दुर्योधन से भी अधम ,
स्वर्ण मृग से घूमते मारीच सदा,
अस्तित्व मनुज का है खतरे में,
          नया व्यूह साहस का रचना होगा ।
           तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।

वो फैले हर दिशा के मोड़ पर,
तांडव सा कर रहे हैं हिंसा का ,
युग युग से पुजती है धरणी पर,
           जग में निर्भय बन साँसें भरना होगा।
           तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।

संकल्प उठाओ युवा शक्ति ,
तुम निर्बल नहीं सबल बनो,
हुंकार शक्ति जब भरती है ,
           युगों - युगों   तक उन्हें डरना होगा ।
           तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।

तुम ही शक्ति , समर्पण हो तुम,
धैर्य , ममत्व और करूणा हो तुम,
समय भाँप लो  वैसा ही रूप धरो ।
        तुम्हें खड्गधारिणी भी बनना होगा ।
        तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।

3 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (19-06-2019) को "सहेगी और कब तक" (चर्चा अंक- 3371) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Jyoti Dehliwal ने कहा…

तुम ही शक्ति , समर्पण हो तुम,
धैर्य , ममत्व और करूणा हो तुम,
समय भाँप लो वैसा ही रूप धरो ।
तुम्हें खड्गधारिणी भी बनना होगा ।
तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।
बहुत सुंदर।

Anita ने कहा…

अंतर में आस्था और विश्वास भरतीं पंक्तियाँ