सोमवार, 17 सितंबर 2012

राही अकेला !


 
चित्र गूगल के साभार 


एक दीप लिए आशा का
अनजाने से  रास्तों पर 
बिना सहारे  वो 
चल ही तो पड़ी है।
वाकिफ नहीं है ,
यहाँ के काँटों और रोड़ों से 
नंगे पाँव चली है।
दीप भरे 
ह्रदय के स्नेह से 
आंधी या तूफानों से 
डर  नहीं लगता उसको 
न स्नेह कम होगा 
न दीप कभी बुझेगा .
रास्ता किसको दिखने चली है?
ये जब पूछा उससे 
तो बोली - 
'पता नहीं कितने बेटे, भाई और काका 
अँधेरे में भटक रहे हैं,
अनजाने और अँधेरे में 
खुद को ही कुंएं में धकेल रहे हैं।
सोचा उन्हें राह दिखा दू,
पता नहीं कब चल दूं?
किसी बेटे भाई और काका की 
गोली, लाठी या बम 
मेरा सफर न पूरा कर दे,
भटकूंगी फिर भी 
सो जाने से पहले ये काम कर लूं 
फिर न रही तो क्या 
उनके रास्ते  तो बदल जायेंगे 
और फिर 
कोई और दीप जलाये आएगा 
ऐसे ही रास्ते दिखायेगा 
होगा कोई मानव ही 
जो मानव को दानव से 
महामानव बनाएगा। '

12 टिप्‍पणियां:

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

एक छोटी सी आशा ...इस जीवन को मार्ग दिखाती हैं ..

संजय भास्कर ने कहा…

ऐसे ही रास्ते दिखायेगा होगा कोई मानव ही जो मानव को दानव से महामानव बनाएगा।
.....गहन अनुभूतियों की सुन्दर अभिव्यक्ति !

संजय भास्कर ने कहा…

ऐसे ही रास्ते दिखायेगा होगा कोई मानव ही जो मानव को दानव से महामानव बनाएगा।
.....गहन अनुभूतियों की सुन्दर अभिव्यक्ति !

Pallavi saxena ने कहा…

जाने कब वो दिन आएगा जब मानव दानव से महामानव बन जायेगा।

shikha varshney ने कहा…

अर्थपूर्ण रचना.

Ratan singh shekhawat ने कहा…

बहुत बढ़िया
Gyan Darpan

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

waah kya baat hai. sandesh dene ka uddeshy poorn karti kavita.

वन्दना ने कहा…

जीवन उद्देश्यपूर्ण ही होना चाहिये।

सदा ने कहा…

गहन भाव लिए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

aasha hi jeevan hai..:)

कुश्वंश ने कहा…

आदरणीय रेखा जी hindigen पर आपकी कवितायेँ पढी अच्छी लगी , बेहतरीन भावो को सुन्दर शब्दों से परिभाषित किया है आपने प्रत्यें कथ्य को . अच्छी कविता के लिए बधाई , आपके और ब्लॉग भी अच्छे

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

कुश्वंश जी, बहुत बहुत धन्यवाद , इसी तरह से स्नेह बनाये रखें. आभारी रहूंगी.