गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

अनुत्तरित प्रश्न !


उस वक्त बीच राह में
तुमने साथ छोड़ा था,
और मैं बात जोहती रही
सालों गुजर गए
फिर हार कर
अपनी राहें खुदबखुद तलाश कर
हिम्मत बटोर कर
आगे चल पड़ी.
फिर भी मेरे जेहन में
कुछ अनुत्तरित प्रश्न
आज भी भटक रहे हैं.
मैंने उन्हें संजो कर रखा है.
सोचती रही जिन्दगी भर,
कभी कहीं किसी मोड़ पर
स्वरचित वह नाम,
तुम्हारा चेहरा मिल जाएगा तो -
वही प्रश्न लेकर पूछूंगी
आख़िर क्यों?
आख़िर क्यों?
साथ छोड़ा , मुँह मोड़ा,
बता तो देते
रास्ते नहीं रोकती
सबकी अपनी राहें होती हैं,
बताकर छोड़ते तो
प्रश्नों के बोझ को
यूँ ही ढ़ोती न रहती,
सोच के यूँ ही
तुम्हें खोजती न रहती.
कब मिलोगे?
या फिर इन प्रश्नों का बोझ
जीवन भर ढोते ढोते मैं
अपने सफर का अंत कर दूँगी.

7 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत सारे अनुत्तरित प्रश्न हमे बहुत परेशान करते हैं।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

jivan me adhiktar prashn anuttarit hi rah jate hain aur mann n jane kai uttar swayam liye bilakhta rahta hai

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ज़िंदगी में कहाँ मिलते हैं सब प्रश्नों के उत्तर ? भावों को खूब संजोया है ..

ashish ने कहा…

जिंदगी हमेशा प्रश्नसूचक रही है , कब मिला है सारे सवालो का जवाब. मृगमरीचिका जैसा है सब कुछ .

सुनील गज्जाणी ने कहा…

मेम !
बहुत से प्रश्न अनुतरित होते है सिर्फ समझा जा सकता है व्यक्त नहीं किया जा सकता ,
साधुवाद !

तिलक राज कपूर ने कहा…

हिम्‍मते मर्दां मददे खुदा में हिम्‍मते स्त्रियॉं भी शामिल है। मेरे पुरुष साथियों का विरोध हो सकता है लेकिन मैने स्त्रियों में प्रतिबद्धता की मात्रा अधिक पाई है।
प्रश्‍न, प्रश्‍न की जगह हैं लेकिन उत्‍तर इसी प्रतिबद्धता में छुपा है।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

इसी को जीवन कहते हैं .. कुछ अधूरे प्रश्न सालते हैं उम्र भर .....