मंगलवार, 28 सितंबर 2010

इम्तिहान मेरे सब्र का !

इम्तिहान मेरे सब्र का कुछ
इस तरह तो मत लीजिये.

फूल तो नहीं मांगे हैं मैंने,
काँटों की सजा तो मत दीजिये.

हर गम कुबूल मैंने कर लिया,
अश्कों पर तो मुझे हक दीजिये.

किस तरह झेलूँ तेरी  ये बेरुखी,
आँखें बंद करने का वक्त तो दीजिये.

छुपा  लूंगी सारे जख्मों को सीने में,
लम्हे लम्हे का हिसाब तो मत लीजिये.

कौन सा लम्हा किसकी अमानत हो?
इसको तो खुद तय मत कीजिये.

इम्तिहान मेरे सब्र का कुछ 
इस तरह तो मत लीजिये.

15 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वाह आज तो अलग ही अंदाज़ है ...बहुत खूबसूरत ...

shikha varshney ने कहा…

किस तरह झेलूँ तेरी ये बेरुखी,
आँखें बंद करने का वक्त तो दीजिये

वाह वाह वाह ..बहुत खूब.

ashish ने कहा…

वाह वाह , आज तो आप शायराना अंदाज में है . कानपुर में तो बरसात भी नहीं हो रही है . हा हा

शोभना चौरे ने कहा…

सच आज तो अलग अंदाज है |

देखिये ऐसे ही तो आया कीजिये

Udan Tashtari ने कहा…

हर गम कुबूल मैंने कर लिया,
अश्कों पर तो मुझे हक दीजिये.


-बहुत अच्छा है.

rashmi ravija ने कहा…

.कौन सा लम्हा किसकी अमानत हो? इसको तो खुद तय मत कीजिये.
इम्तिहान मेरे सब्र का कुछ इस तरह तो मत लीजिये.

क्या बात है...दिल की गहराइयों से निकली ग़ज़ल लग रही है...अति सुन्दर

निर्मला कपिला ने कहा…

कौन सा लम्हा किसकी अमानत हो?
इसको तो खुद तय मत कीजिये.
वाह बहुत सुन्दर नज़्म है। बधाई।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

आशीष ,
क्या सुबह से कोई मिला नहीं , क्यों मजाक बना रहे हो? आज तो बारिश नहीं हो रही लेकिन मन बरस पड़ा तो क्या करें?

रश्मि प्रभा... ने कहा…

कौन सा लम्हा किसकी अमानत हो?
इसको तो खुद तय मत कीजिये.
waah

नीरज गोस्वामी ने कहा…

क्या खूब लिखा है...वाह...बहुत अच्छी रचना...

नीरज

मनोज कुमार ने कहा…

आंतरिक करूणा से भरा है!

Shekhar Kumawat ने कहा…

waqy me mujhe to dukha is bat ka hai ki mene pahli bar me hi is gazal ko kyun nahi pada


bahut achhi lagi

तिलक राज कपूर ने कहा…

सब्र का हो इम्तिहां तो इस तरह
तू कहे कि, बस बहुत अब हो गया।

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

वाह जी क्या बात है...बहुत ही शिकायतों से भरी गज़ल है. हर शेर लाजवाब.

मनोज कुमार ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
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