मंगलवार, 10 अगस्त 2010

खाली हाथ !

मैं 
कुछ इस तरह 
मजबूर हुआ,
कि उठ नहीं सकता,
वक्त की मार कहूं
या तकदीर का सौतेलापन
कल तक
हाथ में हाथ लेकर 


घूमते थे दोस्त मेरे
आज 
कुछ इस तरह 
गुजर जाते हैं,
जैसे पहचानते नहीं.
अरे सहारा नहीं माँगा
मुस्करा कर
एक नजर देख ही लेते
हम भी कुछ 
सोच कर खुश  हो लेते.
पर वे 
सहारे के खौफ से
दूर से गुजार गए.
सही कहा है
वक्त साथ है
सब साथ हैं
नहीं तो

इंसां बस खाली हाथ है.

3 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यूँ तो इंसान खाली हाथ आया है और खाली हाथ जायेगा ....पर जीवन में दोस्तों का साथ होता है हाथ में हाथ होता है ...इस तरह खौफ भला क्यों ?

अच्छी भावाभिव्यक्ति ..

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

हाँ, संगीता ये हकीकत है, कभी कभी ऐसे भी दौर जिन्दगी में इंसां देखता है कि दोस्त ही नहीं बहुत अपने भी साथ छोड़ देते हैं.

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी कविता। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
विचार-परिवार