शुक्रवार, 22 मई 2009

चुनाव - आंतरिक युद्ध

महासमर
जिसको कहते रहे सब,
क्या वाकई
एक आंतरिक युद्ध है ?
वही तो है --
देश कहाँ है?
कहाँ जा रहा है?
क्या भविष्य होगा?
इसकी किसको ख़बर है,
बस इतना ही तो है,
हम तुमपर
औ' तुम हमपर
कीचड़ उड़ा रहे हैं,
हमसे (जनता)
कभी जानना चाहा है
किसे चाहती है?
क्या चाहती है?
अपनी - अपनी
स्वार्थी नीतियों को
चाशनी में डुबोकर
सबके सामने
परोसते रहे हैं।
कुछ नहीं दिखता है
एक घना अँधेरा है
हर तरफ
एक लड़ाई -- जिसमें
न तलवारें खिंचीं -
न गोलियां चलीं -
चलते रहे वाक् शर
आक्षेप , प्रत्याक्षेप ही
वह अस्त्र बने
गरिमा जिसने
तार-तार कर दी।
अपनी दुश्मनी का
बदला लेने
बहुत अच्छा मौका मिला,
अपराधी खुले घूमने लगे
और
चुनाव की आड़ में
शक्ति का
खुला दुरुपयोग हुआ।

दलों की अपनी
अलग अलग नीति हैं
नहीं पता है उनको
कि समृद्धि है किसमें
कहाँ उपयोग करें ?
हम अपने विवेक का--
विवेक धन
कहाँ जा रहा है?
पार्कों, स्मारकों या फिर
अपनी जन्म स्थली को
चमकीले सितारों से
सजाकर
इतिहास लिखने में
इसका यह तो
नहीं मतलब
कि आप इस काबिल हो गए,
कि देश सौंप दें तुमको ,
जो नहीं जानते
कि हम कहाँ हैं?
और हमें कहाँ जाना है?
प्रगति की जरूरत कहाँ है?
विवेकहीन निर्णय
वही बन्दर के हाथ
रिमोट आ गया
क्या करना है?
इसको उसको बुद्धि कहाँ है?
और उसकी तरह ही
कुछ और बन्दर
जय हो , जय हो,
कहकर पीछे चल रहे हैं?
भोला भाला जनमत ठगा जा रहा है
कहीं तो कुछ
नजर नहीं आ रहा है।
वे विवेकहीन सही,
हमें तो देश बचाना है,
अपने निर्णय को
सार्थक दिशा में
लगाना है.

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