शुक्रवार, 10 जून 2016

तारणहार !

बेटा
तारणहार
कुल दीपक
और न जाने क्या क्या ?
वर्षों पहले
निकाला था घर से ,
भटकते रहे दर-ब-दर
पनाह दी किसी अनाथ ने ।
अपने अनाथ होने के दुख को
भूल जाने के लिए ,
बहुत प्यार दिया ,
बहुत आशीष लिया ।
इक दिन चल दिये
तो
बेटे को खबर दी ,
आया और संगत में बैठा रहा ।
कांधे औरों ने दिये
बाप की आत्मा
बार बार बाट जोहती रही
अब मेरा बेटा काँधे पर उठायेगा ,
फिर मुखाग्नि देगा ।
आखिर खून है मेरा ,
लेकिन
पता नहीं कब वो तो
रास्ते से वापस हो गया ।

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (12-06-2016) को "चुनना नहीं आता" (चर्चा अंक-2371) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

महेश कुशवंश ने कहा…

बेहद संवेदनशील रचना , बधाई