बुधवार, 17 अगस्त 2011

दोहरा सत्य !

वो दर्द का एक सैलाब दिल में लिए,
यूं ही सबकी ख़ुशी में मुस्कराती रही,
आँखों में बसी उदासी औ' नमी को ,
झुका कर नजरें दुनियाँ से छुपाती रही।

रोका उसे औ' झांक कर आँखों में उसकी,
एक दिन मैंने पूछ ही लिया उससे कि ,
क्यों तुम बाहर से खुश दिखने के लिये,
इस तरह अपनाकलेजा जलाती हो तुम?

छूते ही मर्म बह निकला दर्द शिद्दत से,
उमड़ते हुए गुबार उसमें सब बहने लगे,
हंसती हूँ तो लोग शामिल भी कर लेते हैं
रोई हूँ जब तक कतरा कर निकल गए।

ab to समझ ली है रीत दुनियाँ की,
गर उनकी ख़ुशी में हंसों तो ठीक है,
वो तुम्हारे ग़मों को बाँट कर कभी
तुम्हारे साथ रोने कोई नहीं आता।

14 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

तुम्हारे साथ रोने कोई नहीं आता। ... jo aaya wahi sach hai, dohre satya se aansuon ka sailab badhta hai

सदा ने कहा…

छूते ही मर्म बह निकला दर्द शिद्दत से,
उमड़ते हुए गुबार उसमें सब बहने लगे,
हंसती हूँ तो लोग शामिल भी कर लेते हैं
रोई हूँ जब तक कतरा कर निकल गए।

बिल्‍कुच सौ फीसदी सच कहा है आपने ..आभार ।

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

बहुत ही अच्छे व प्यारे शब्द है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत ही सशक्त रचना है!

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

sandeep jee,

isa blog tak aane ke liye aapaka svagat hai aur abhari hoon.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

सच कहा आपने .

ashish ने कहा…

मर्मस्पर्शी लेकिन कटु सत्य . आभार

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बिल्‍कुच सौ फीसदी सच कहा है आपने ..आभार ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सटीक है ...हंसी में सब साथ देते हैं और दुःख अकेले ही झेलना होता है ..

anu ने कहा…

दुनिया की रीत को समझा दिया ...रोने वाले के साथ कोई नहीं होता .....कटु सत्य

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Babli ने कहा…

गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने! हर एक शब्द दिल को छू गई! आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है! इस उम्दा रचना के लिए बहुत बहुत बधाई!

वन्दना ने कहा…

यही है दुनिया की रीत्।

Rajiv ने कहा…

"हंसती हूँ तो लोग शामिल भी कर लेते हैं
रोई हूँ जब तक कतरा कर निकल गए।"

अत्यंत मार्मिक एवं सच्चाई में सनी कविता.मनोभावों का अत्यंत सुन्दर चित्रण.

P.N. Subramanian ने कहा…

बड़ी खूबसूरत रचना. "तुम्हारे साथ रोने कोई नहीं आता।" यह तो कटु सत्य है.