सोमवार, 4 अप्रैल 2011

इम्तिहान दिया है मैंने !

अपने हक में आये तेरे इस दर्द को ,
आहिस्ता-आहिस्ता पिया है मैंने।

जब न सहा गया तो भींच कर होंठों को ,
नाम लेकर तेरा हर पल जिया है मैंने।

किसने पूछा है कभी जिन्दगी में मुझसे ,
कौन से ज़ख्म पर कैसा पैबंद सिया है मैंने।

होंठों पर हंसी लेकर औ आँखों में नमी ,
दुनियाँ के कहने पर इम्तिहान दिया है मैंने।

दिख न जाए आँखों में तस्वीर तेरी,
भूल से भी तेरा नाम न लिया है मैंने।

अपने दर्द तो जी ही चुके हम अब तक ,
दोष भी तो कभी तुमको न दिया है मैंने।

कोई टिप्पणी नहीं: