मंगलवार, 29 मार्च 2011

ये त्रासदी !


रे धृष्ट मानव
क्यों खेल रहा है?
प्रकृति के जर्रे जर्रे से,
माना बुद्धि बहुत है तेरी,
अनुसंधानों से है धरा भरी
तेरे सारे मंसूबों को
पल में खाक किया इसी प्रकृति ने,
थर्रायी धरती और
जब सागर ने उछाल भरी,
फटने लगा जब ज्वालामुखी
गैसों ने भी उबाल भरी,
लहरों ने समेटा अपने में,
तिनके सी तेरी सत्ता को,
ताश के पत्तों सा बिखर गयी
वर्षों से सजाई दुनिया तेरी

जीवन मानव का सिमट गया
लहरों के तेज सुनामी में
जो बचा खुचा सा जीवन है
गैसों ने इसे लपेट लिया।
हाहाकार मचा विश्व में
ये हाल तो उस धरती का है,
जो जागरुक थे भू कम्पन से।
शेष अभी तो सोच रही है,
कब कैसे क्या करना है?
जब घट जाएगी घटनाएँ
तब आकलन करेंगे कमियों का,
फिर क़ानून बनेंगे, लागू होंगे,
मानक पर फिर मानक होंगे।
कुछ मानक पैसे से बिकेंगे
कुछ तो बस मानक होंगे।
जीवन निर्दोषों का जाएगा,
उनके लिए ही त्रासदी होगी।
कब सुना कोई बड़ा
इस हादसे का शिकार हुआ।
अरे अब तो चेतो तुम
धरा के मत खिलवाड़ करो।
मानव हो मानव बनकर
मानव सा ही व्यवहार करो


5 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

manav sa vyavahaar hi trasdi ko rok sakta hai

ashish ने कहा…

हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ करेंगे तो क्या प्रकृति के हाथों में मेहदी लगी है? जैसे तो तैसा .

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

संदेशात्मक रचना ...अब भी मानव सुधर जाए

सारा सच ने कहा…

मेरी लड़ाई Corruption के खिलाफ है आपके साथ के बिना अधूरी है आप सभी मेरे ब्लॉग को follow करके और follow कराके मेरी मिम्मत बढ़ाये, और मेरा साथ दे ..

Kumar Anurag ने कहा…

Rekha ji sachmuch aapke lekhan jeevan ke karib hote hain, usme sabhi tatwa maujud rahten hain jo manushy ke ki pida, harsh aur gahan vishad ko janm dete hain, ye sabkuchh apne hi dwaara arjeet hai, fir ham isko lekar pachhtate bhi hain aur halat bhi ham hi paida karte hain, yah samjh men nahi aata ki akhir ham kya chahte hain? bada kathin hai ye jeevan ka dagar, ya is ham aisa bhi kah sakte hain ki yah bhi ke jaroori tatwa ha jindi ke liye, Harsh aur vishad, purn hone ke liye manav ko.