शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

अप्रियं सत्यम् न ब्रूयात !

सच्चाई की कसौटी पर
कसने के लिए
जब अग्नि साक्षी मानकर
खड़ी हुई,
ऑंखें नम हुई,
ओंठ थरथराने लगे
क्या करने जा रही हूँ?
औरों की नजर में
ख़ुद को औ' अपनों को
उघाड़ने जा रही हूँ.
ये सच्चाई
सिर्फ चर्चा का विषय
बना सकती है।
किसी के जीवन को
दिशा और हल
वह भी नहीं दे सकती है।
इस प्रकरण के बाद
अपनी - अपनी नजर से
आलोचना-समालोचना
सब कर सकते हैं और करेंगे।
सड़क चलते
व्यंग्य बाणों का शिकार
कौन बनेगा?
मैं ही न,
बल्कि कई पीढ़ियों तक
ये सत्य
पीछा नहीं छोड़ेगा,
आने वालों तक को
इस सच्चाई की आंच
झुलसाती रहेगी
फिर क्या मिलेगा मुझको?
कोई इस सत्य और असत्य की
विभीषिका से
निकाल कर
क्या दे सकता है?
एक नया नाम या नया जीवन।
नहीं
ये तो भ्रम मात्र है।
उस अग्नि की तपन ने
जला दिया कलुष सारा
तब जाकर याद आई
ये सूक्तियां :
सत्यम् ब्रूयात
अप्रियं सत्यम् न ब्रूयात।
और फिर
जीवन उसी तरह
पुराने ढर्रे पर
जीना शुरू कर दिया।
शायद यही प्रारब्ध है
और नियति भी।

4 टिप्‍पणियां:

Mired Mirage ने कहा…

सुन्दर व सही लिखा है.
घुघूती बासूती

अनुनाद सिंह ने कहा…

रेखा जी, आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में अभिन्न्दन है। खुशी की बात है कि आप मशीनी अनुवाद से जुड़ी हुई हैं जो मेरे विचार से हिन्दी के लिये अति महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

इसी लगे आपसे निवेदन है कि आप हिन्दी विकि (hi.wikipedia.org/) पर मशीनी अनुवाद एवं अन्य विषयों पर लेखों का योगदान कर हिन्दी विकि को विश्व की सर्वश्रेष्ठ विकियों में शामिल करने में मदद करें।

Pankaj Mishra ने कहा…

sahee baat hai jis baat se kisi ko takaleef ho aisaa saty kabhee bhee nahee bolanaa chahiye

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

anunaad ji,

main koshish karoongi ki isa vishay men jo bhi mujhe jaanakari hai, usase sabko parichit kara sakoon. samay milane par karati hoon.