बहुत साल पहले
जब ये सब नहीं हुआ था,
होता तब भी था ,
किन्तु परदे में छुपा था.
मेरा मन तब भी
इनसे खफा था.
वह प्रवचन दे रहा था
भीड़ से भरे पंडाल में
गुरु की वाणी
ईश्वर का आदेश
तभी मेरा अंतर बोला -
'चाहे रखा हो
बहुरुपये ने वो वेश?'
आत्मा शुद्ध हो
वाणी औ' मन भी
कभी कटु न बोलो,
ह्रदय किसी का
तुम्हारे वचनों से
व्यथित न हो.
जो भी अर्जित करो
धर्म, धन या धैर्य
कुछ अंश उसका
औरो पर व्यय करो.
फिर मन बोल उठा -
'पर
जो तुम कमा रहे हो
वहा कहाँ जा रहा है?
साथ में ये
सुंदरियों का हुजूम
जिन्हें सेविकाएँ कर रहे हो
कौन सी सेवा करती हैं?'
इन प्रश्नों का उत्तर
इस प्रवचन के बीच
कुछ और भी उठा रहे थे.
आत्मा की शुद्धि की
बात करने वाले
क्या कभी खुद भी अपनाया है.
ये उपदेश हमें देने के स्थान पर
कभी खुद पर लिए हैं
जानो अपने अंतर में
खुद क्या हो?
फल, मेवा, मिष्ठान के
भोग लगाने वाले
क्या त्यागा तुमने?
भोग या योग?'
फिर बोले वे
भोग त्याग कर
योग की शरण में जाओ,
वही कल्याण हो सकता है,
मुक्ति का वही एक रास्ता है.
रुका नहीं मन
फिर चिहुक उठा -
'अरे बाबा
अपने भोग की बात करो
त्यागा या नहीं
ये हम नहीं साक्ष्य कह रहे हैं.
वे जो तुम्हारी छाया में जी रहे हैं.
कितना प्रसाद पा रहे हैं.
गुरु के दर्शन,
गुरु का सानिंध्य,
गुरु का आशीर्वाद,
कौन ले रहा है?
इस भगवा और श्वेत
वस्त्रों के पीछे
कितने काम रंगीन हो रहे हैं
ये हम आज नहीं
कल खोज लेंगे.
इनके पीछे कितने और कैसे
कर्म संगीन हो रहे हैं?'
अंतर की आवाज चुगली
कर गयी.
किसी साधक ने सुन लिया
कितने साधक
उस दिन टूट पड़े थे
मुझे लहूलुहान कर दिया
वर्षों गुजर गए
आज सच्चाई खुल रही है
तो उनके और सबके साधक
सिर पीट रहे हैं,
क्या पता हम भी
इसी तरह से छले जा रहे हों?
मेरा अंतर न तब
न अब
मानव से ऊपर किसी मानव को
स्वीकार नहीं करता .
सिर्फ एक सच्चा मानव ही पूज्य है.
उसके लिए वस्त्रों के बदलने की
जरूरत नहीं होती,
अपने सद्कर्मों को
दिखाने के लिए पंडालों
की भीड़ भी नहीं होती.
कर्म खुद बोलते हैं
अपने मुंह से न सही
औरों कि जुबान से बोलते हैं.
जीवन में सिर्फ
एक बार किसी के दुःख बांटों
बहते हुए आंसुओं को पोंछो
मेरी नजर में
तुमसा वन्दनीय और पूज्यनीय
मानव कोई नहीं.
इस लिए सिर्फ
मानव बनो.
