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शनिवार, 22 मई 2010

पत्थर बना दिया !



सोचती हूँ अब भी 
न जाने क्यों,
वक़्त के थपेड़ों ने मुझे
पत्थर बना दिया.
थी तो मैं 
समंदर के किनारे की रेत
जिसने रखे कदम 
दिल में समा लिया.
प्यार के अहसास से
इतना सुख दिया
हर आने वाले को
अपना बना लिया.
अब मगर 
बात कुछ और है
बोले बहुत बोल 
ज़माने ने इस तरह
पत्थरों पर भी
कभी दूब उगा करती है.
उन्हें पता कहाँ है
कि पत्थरों के गर्भ में
नदियाँ भी पला करती हैं.
जमीं पर जो है
नदियाँ 
पहाड़ों से
जमी पर गिरा करती हैं.
कोई  बताये उनको
लोग बदल गए हैं
फिर भी ये निर्जीव
पत्थर
इंसान से बेहतर हैं
ये तो नहीं कि
सीने से लगा कर
खंजर चुभा दिया.
देखा किसी तृषित को
पत्थर ने सीना तोड़ कर
ममता औ' स्नेह का 
अविरल सोता बहा दिया.
फर्क  नहीं उसको
चाहे कोई उठाकर
मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे 
की दीवार पर रखे
या फिर
किसी की कब्र पर सजा दिया.