वो कला दीर्घा
स्कूल के बच्चों की
मन मोहक तस्वीरें
बाल मन, कच्चे भाव
फिर भी
बहुत बारीकी से उकेरा था.
अपनी कल्पनाओं के
अपनी संवेदनाओं के
औ' भावनाओं के
प्रतिबिम्ब बना -
कहीं शाम तो
कहीं सवेरा बिखेरा था.
एक कोने में रखी
एक कृति
जिसमें
एक मोमबत्ती जलकर
बहा रही थी मोम का दरिया,
साथ में खामोश
एक नारी की आँखों से
झरते अश्कों की लड़ियों से
बह रहा अश्क का दरिया था.
पास में बैठी
खामोश बाला ने
अपनी परिकल्पना को
यूं शब्दों में ढाला था --
'ये मेरी माँ है,
जो खामोश उम्र भर
रोती रही,
ये दरिया मैंने बनाया है.
रोकर भी
हमें अच्छा बनने की
सीख देती रही,
अँधेरे रास्तों में
रोशनी की किरण बनी रही,
एक मोमबत्ती की तरह
जो दूसरों को
रोशनी देने के लिए
खुद जलकर बह जाती है,
अपने अस्तित्व को
ख़त्म कर देती है.
दोनों का जीवन
एक जैसा ही है न.
मुझे जो लगा
मैंने उसी को बनाया है
माँ के साथ
इस मोमबत्ती को सजाया है.................'
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बुधवार, 24 मार्च 2010
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