करना अपनी मौत का फैसला
क्या इतना ही आसान होता है?
पहले सौ बार दिल सोचता है,
अकेले ही जार जार रोता है।
अपने ग़मों की हदें गुजर जाने पर
इंसान कभी कभी आपा खोता है।
ख्याल अपने बच्चों का उसके जेहन में
एक नहीं बार बार सामने से गुजरता है।
जीवन के सुहाने और दुखद पलों का
गुजरा सिलसिला भी नजर में तैरता है।
डगमगाते हैं कदम उसके फिर
हालात का भी एक वास्ता होता है।
कुछ सुखद पलों का साया भी
उससे साहस को हिला भी देता है।
फिर दिल पर लगी चोट का अहसास
उसके फैसले पर मुहर लगा देता है।
इन पलों को गर टाल दे कोई तो
जिन्दगी का ही पलड़ा भरी होता है।
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सोमवार, 16 मई 2011
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