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बुधवार, 18 मई 2011

चार लाइने !

इस को लिखने बैठी तो फिर इससे ज्यादा लिख ही नहीं पाई क्योंकि ये एक उत्तर था किसी के प्रश्न का और जितना बड़ा प्रश्न उनता ही तो उत्तर होता है।

अपने को मैंने बहुत पहले ही पढ़ लिया है

तभी तो जिन्दगी को इस तरह गढ़ लिया है,

अब क्या सुनाएँ दोस्त दास्ताने जिन्दगी,

वक़्त के पहले ही खुद सूली पर चढ़ लिया है


* * * * * *

ये कामना ही मेरी भगवान से,

जियें जब तक जियें सम्मान से,

दूर ही रखे वो मुझे अभिमान से,

मूल्य प्रिय हों सभी को जान से