नव वर्ष की रात की चलती सर्द हवाएं ,
सर्द न कर सकीं उनके फन और हौसलों को,
लोग लवरेज जोश भरे इरादों से नाचे रात भर ,
उनके हाथ चलते रहे अपने अपने साजों पर ।
दूसरों की खुशियों में शामिल हों या न हो,
वे साजों पर अंगुलियाँ रात भर नचाते रहे ।
लेकिन उनकी उँगलियों के नाचने से जुड़ी थीं,
कुछ लोगों की रोटी, दवा , फीस औ' किराया।
वे बस इसी मजबूरी में नववर्ष का स्वागत,
अपने लाडलों को गले से लगाकर न कर सके।
फिर सुबह की सर्द हवाएं और तेज बौछारों में
जब उपहार लिए लौटे तो गले से लगा लिया ।
यही नववर्ष है जब चेहरों पर मुस्कान खिले,
दिन कोई भी हो खुशियों, उम्मीदों का दीप जले।
