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सोमवार, 2 जनवरी 2012

हर दिन नव वर्ष !

नव वर्ष की रात की चलती सर्द हवाएं ,

सर्द न कर सकीं उनके फन और हौसलों को,


लोग लवरेज जोश भरे इरादों से नाचे रात भर ,

उनके हाथ चलते रहे अपने अपने साजों पर ।


दूसरों की खुशियों में शामिल हों या न हो,

वे साजों पर अंगुलियाँ रात भर नचाते रहे ।


लेकिन उनकी उँगलियों के नाचने से जुड़ी थीं,

कुछ लोगों की रोटी, दवा , फीस औ' किराया।


वे बस इसी मजबूरी में नववर्ष का स्वागत,

अपने लाडलों को गले से लगाकर न कर सके।


फिर सुबह की सर्द हवाएं और तेज बौछारों में

जब उपहार लिए लौटे तो गले से लगा लिया ।


यही नववर्ष है जब चेहरों पर मुस्कान खिले,

दिन कोई भी हो खुशियों, उम्मीदों का दीप जले।