जो ये कलम चल रही है,
हर दिशा में
आग उगल रही है.
नाहक ही बन्दूक सी
हर समय गरजा करती है.
कभी इसके दर्द को समझो,
ये सच है
कि ये लिखती यथार्थ है
मगर
ये कोई न कोई दर्द बयां करती है.
चाहे वे शब्द
स्याही की जगह
आंसुओं से सने हों
शब्दों ने दर्द को
जीकर ही
कराह अपनी जो सुनाई
तभी तो वह विष वमन करती है.
सुनती है कितनी जबानों से
दर्द से सराबोर दास्तानें
उन्हीं में डूब कर
दर्द के अहसास को
पहले जीती औ'
फिर दास्तान बयां करती है.

