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गुरुवार, 6 मई 2010

नाम रोशन कर्मों से!

लोग कहते हैं ,
जमाना बदल गया है.
बेटे और बेटियां एक समान,
पर फर्क
दिख जाता है,
कुलदीपक होना जरूरी है.
वंश  का नाम चलेगा.
लड़कियाँ थोड़े ही चलाती हैं.
हम क्यों भूल जाते हैं
गर लड़के कुलदीपक है,
तो लड़कियाँ कुल ज्योति क्यों नहीं? 
नाम रोशन बेटे या बेटियां नहीं,
अपने  कर्मों से होता है.
सम्मान भी अपने कर्मों से मिलता है.
बेटे या बेटियां 
कितनी पीढ़ियों तक
आप का नाम चला लेंगे?
आप ही बतलाइये
आपके प्र-प्रपितामह क्या थे?
उनके नाम और उनके पिता का नाम
अपने गाँव और देश में
पूछ कर आइये
कोई नहीं बता पायेगा.
फिर वंश का क्या अर्थ?
गाँधी-नेहरु की बात लीजिये
गर इंदिरा न भी होती
तो नेहरु वही थे,
गाँधी तो
अपनी संतति से नहीं
अपनी पहचान खुद बने,
सिर्फ एक नहीं
सम्पूर्ण विश्व पटल पर
एक प्रतीक बन गए.
फिर 
हम क्यों सोचते हैं?
नाम कोई और रोशन करे,
खुद ही क्यों नहीं?
करें कुछ कर्म ऐसे
रच जाएँ कुछ ऐसा
जो सदियों तक साक्षी रहे
हमारे कर्मों के,
नाम तो सदा रहेगा.
कोई पढ़ेगा या सुनेगा तो कहेगा ,
 ये कोई सज्जन व्यक्ति थे.
ये मील का पत्थर 
कोई मिटा नहीं पायेगा.
कुल दीपक या कुल ज्योति 
इसके लिए जिम्मेदार नहीं?
हमारे कर्म ही हमारे जिम्मेदार हैं.
नाम रोशन करे या फिर कालिख पोत दें.