खून ही रचता है साजिशें, जिन्हें खून की जरूरत ही नही,
वर्ना पड़ोसियों को तो अपने से फुरसत ही नहीं।
इल्जाम कैसे-कैसे लगाये शर्म से झुका है सिर ,
अपनों पर इल्जाम लगाने की तो फ़ितरत ही नहीं।
हमने तो उनको अपना मान गले से लगाया,
जगह दिल में दी , उन्हें देखने की फुरसत ही नहीं ?
दर और दीवारें रंगीन है अपनों के ही खून से ,
वे समझ लें कीमत इतनी अच्छी मेरी किस्मत ही नहीं ?
जिंदगी में कदम-कदम पर साथ निभाया हमने,
नज़र में उनकी इस साथ की कोई अहमियत ही नहीं।

2 टिप्पणियां:
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 7 अक्टूबर 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
सुंदर ग़ज़ल
सादर
एक टिप्पणी भेजें