मंगलवार, 9 जून 2020

गुमनाम !

वो संगतराश
जिसे लोग पत्थर दे जाते थे
कुछ अपने होते थे
और कुछ पराये भी होते।
वह उन्हें तराश कर
ढाल देता एक आकार में,
रास्ते के वे पत्थर मुखर हो उठते ।
आते वे और ले जाते,
किसी ने सजा लिया घर में
और किसी ने भेंट कर दिया ।
किसी ने बैठाकर मंदिर में,
उन्हें टकसाल बना लिया ।
वो जिंदगी भर
उन बेतरतीब पत्थरों को
रूप देता रहा,
आकार देता रहा,
सिर्फ हुनर के लिए,
लेकिन उसका खरीददार कोई न था ।
पत्थर मेरा
तो हकदार भी हम
तुम्हें गढने का शौक था
फिर उस आकृति से क्या ?
कभी सवाल किया -
तो दुत्कार दिया
तुम्हारा हुनर मेरे ही पत्थरों पर निखरा
वर्ना कौन जानता था ?
ये आकृतियाँ भी नहीं
गुमनाम रहो , गुमनाम जिओ ।
ये वो कृतियाँ नहीं ,
जिन पर नाम लिखे जाते है,
जिन्हें गैलरियों में नाम दिए जाते है।
वो हुनर सीख लो
तब आ जाना ,
दाम तब लगायेंगे।
खरीददार तब ही आयेंगे ।

15 टिप्‍पणियां:

  1. वो हुनर सीख लो
    तब आ जाना ,
    दाम तब लगायेंगे।

    वाह ! शानदार रचना

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  2. मज़दूर का दर्द भी तो यही है ... तराशता है इमारतों को पर दूसरे के लिए ... गहरी सोच भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...

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  3. ये वो कृतियाँ नहीं ,
    जिन पर नाम लिखे जाते है,
    जिन्हें गैलरियों में नाम दिए जाते है।
    वो हुनर सीख लो
    तब आ जाना ,
    दाम तब लगायेंगे।
    खरीददार तब ही आयेंगे ।
    बेहतरीन रचना ,लाजवाब

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  4. वो हुनर सीख लो
    तब आ जाना ,
    दाम तब लगायेंगे।
    खरीददार तब ही आयेंगे ।
    अद्भुत यह सच है कभी-कभी यह समझ में ही नहीं आता कि ऐसा क्यों होता है आपने तो महसूस भी कर लिया और लिख भी दिया चरण स्पर्श प्रणाम

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  5. क़ीमत तो हुनर की ही है, पर कई बार हुनरमंद गुमनाम रह जाते हैं। बहुत सुन्दर रचना।

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