hindigen

जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.

मंगलवार, 29 मई 2018

आज भी !

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अरे वनिता तुम आज भी सुन रही अपशब्द, सह रही हो अपने जनक - जननी के लिए सदियों से चले आ रहे वही जुबान पर बसे  विशेषण। अपना सर्वश्रेष्ठ ...
शुक्रवार, 30 जून 2017

सावन !

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सावन में  अब फुहारें नहीं पड़ती  न हरी चूड़ियों की  खनखनाहट सुनाई देती है।  हरियाली तीज  अब हरियाली को तरसती है , शादी के बाद  ...
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सोमवार, 23 जनवरी 2017

पतंग !

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खुले आसमान में विहान से उड़ते रहो पतंग मत बनना कभी। वो पतंग जो डोर दूसरों को देकर आसमान में नचाई जाती है , न मर्जी  से उड़ती है और...
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बुधवार, 21 दिसंबर 2016

ख़ामोश !

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खामोश  कभी कहता है कोई, खामोश कभी रहता है कोई, फिर भी जीवन में इस खामोश का अटूट रिश्ता है। पता नहीं जन्म से लेकर अब तक वो कितना ब...
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

ये कैसा दण्ड !

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 प्रकृति क्रुद्ध फटते हैं बादल दरकती है भू तड़ित छूने लगी आसमाँ से जमीं को पर इति तो हमारी है मानव की है दण्ड  ही तो है हमारे कर्मो...
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बुधवार, 29 जून 2016

बनो दीप से !

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बन सको तो  दीपक की मानिंद बनो , जग रोशन कर जाता है , खुद जल कर ही सही , उसका नाम  बन चुका है  उजाले का पर्याय।  कि...
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रविवार, 19 जून 2016

पितृ दिवस पर !

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बहुत याद आते हो तुम रोने को जब दिल करता  है , पापा ऐसा क्यों लगता है ,साथ हमारे आज भी हो।  अपनी छाया में रखते थे ,अलग कभी भी नहीं क...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
कानपुर , UP, India
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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