hindigen

जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

ये कैसा दण्ड !

›
 प्रकृति क्रुद्ध फटते हैं बादल दरकती है भू तड़ित छूने लगी आसमाँ से जमीं को पर इति तो हमारी है मानव की है दण्ड  ही तो है हमारे कर्मो...
4 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 29 जून 2016

बनो दीप से !

›
बन सको तो  दीपक की मानिंद बनो , जग रोशन कर जाता है , खुद जल कर ही सही , उसका नाम  बन चुका है  उजाले का पर्याय।  कि...
2 टिप्‍पणियां:
रविवार, 19 जून 2016

पितृ दिवस पर !

›
बहुत याद आते हो तुम रोने को जब दिल करता  है , पापा ऐसा क्यों लगता है ,साथ हमारे आज भी हो।  अपनी छाया में रखते थे ,अलग कभी भी नहीं क...
4 टिप्‍पणियां:
शुक्रवार, 10 जून 2016

तारणहार !

›
बेटा तारणहार कुल दीपक और न जाने क्या क्या ? वर्षों पहले निकाला था घर से , भटकते रहे दर-ब-दर पनाह दी किसी अनाथ ने । अपने अनाथ होने क...
2 टिप्‍पणियां:
मंगलवार, 7 जून 2016

बेबसी !

›
कभी कभी सामने से ऐसा गुजर जाता है कि न रोना आता है और न कुछ कर पाते हैं।  ऐसी देखी एक दिन बेबसी और फिर ये कविता रची। स्वेद बिंदु ...
1 टिप्पणी:
बुधवार, 9 मार्च 2016

तस्वीरें और यादें !

›
कुछ धुँधली सी  यादों पर  जब पड़ जाती है  उजली सी तस्वीरों का  चमकता हुआ सूरज।  फिर क्यों ? वापस हम  जीने लगते हैं  अतीत के ...
4 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

मेरी डायरियां !

›
मेरी डायरियां  मेरी संवेदनाओं की  साक्षी , बचपन से अब तक की साथी , उम्र के साथ  उनकी उम्र नहीं  उनकी संख्या बढ़ती गयी।  इनकी कीमत  मे...
2 टिप्‍पणियां:
‹
›
मुख्यपृष्ठ
वेब वर्शन देखें

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
रेखा श्रीवास्तव
कानपुर , UP, India
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें
Blogger द्वारा संचालित.