hindigen

जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

हाइकू !

›
नवरात्रि में कन्या पूजन किया फिर की हत्या . ******* या देवि कहो या फिर देखो उसे भोग्या का रूप . ******* पूजिता तो है वह हर हाल मे...
2 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 8 सितंबर 2014

ऐसा भी होता है !

›
कितने अजीब  होते हैं ये भाव  मन में उमड़े बादल से  जल्दी से उठी  सोचा दर्ज कर लूँ , कागज और कलम  जब तक हाथ में आई  वो कपूर की तरह  क...
3 टिप्‍पणियां:
गुरुवार, 4 सितंबर 2014

कठपुतली से पर्दानशीं तक !

›
जिंदगी अपनी जन्म से जिनके हाथों में , जिनकी मर्जी पर और जिनके लिए जीते रहे ,  उस  रूप को हम आज कठपुतली का नाम देते हैं। शास्त्रों ...
2 टिप्‍पणियां:
मंगलवार, 26 अगस्त 2014

दर्द पेड़ों का !

›
दर्द पेड़ों का समझ नहीं सकते ,  बदलते हुए मौसम ने उन्हें पत्तों से जुदा  कर दिया . मेरे आँगन में खड़े वो दो अमरूद के पेड़ जिनके आ...
8 टिप्‍पणियां:
गुरुवार, 17 जुलाई 2014

जला घर किसी का !

›
अंतर की ज्वालामुखी  जब पिघलती है  लावा बन  वो कलम से  आग उगलती है।  वाह ! वाह !  सुनकर वो  सिर पटक कर  रो देती है -  दर्...
2 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 4 जून 2014

आंसुओं से नाता !

›
नारी तू  लेकर नाता  अपने आंसुओं से  धरती पर  पैदा ही क्यों हुई ? जब छोटी सी बच्ची  भर भर आँखें  क्यों रोती है ? जोड़ कर  अपनी गुड़...
4 टिप्‍पणियां:
मंगलवार, 3 जून 2014

मौत !

›
मौत तू  चुपचाप आना  आहट तेरी सुनकर  सब काँप जाते हैं।  जानते हैं हम  तुझे आना ही है  एक दिन  लेकिन  इतना रहम करना  झपट कर  जल्दी...
2 टिप्‍पणियां:
‹
›
मुख्यपृष्ठ
वेब वर्शन देखें

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
रेखा श्रीवास्तव
कानपुर , UP, India
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें
Blogger द्वारा संचालित.