जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.
गुरुवार, 11 सितंबर 2014
सोमवार, 8 सितंबर 2014
गुरुवार, 4 सितंबर 2014
मंगलवार, 26 अगस्त 2014
गुरुवार, 17 जुलाई 2014
बुधवार, 4 जून 2014