hindigen

जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.

बुधवार, 4 जून 2014

आंसुओं से नाता !

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नारी तू  लेकर नाता  अपने आंसुओं से  धरती पर  पैदा ही क्यों हुई ? जब छोटी सी बच्ची  भर भर आँखें  क्यों रोती है ? जोड़ कर  अपनी गुड़...
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मंगलवार, 3 जून 2014

मौत !

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मौत तू  चुपचाप आना  आहट तेरी सुनकर  सब काँप जाते हैं।  जानते हैं हम  तुझे आना ही है  एक दिन  लेकिन  इतना रहम करना  झपट कर  जल्दी...
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सोमवार, 2 जून 2014

हाइकू !

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हाइकू ! माँ बेटों को थी आँचल में छिपाए तपती रही। ***** रिश्तों का दीप स्नेह मांगता ही है जलेगा कैसे? ****** उदास मन ख...
शनिवार, 3 मई 2014

हाइकू !

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कुलदीपक आज भी जरूरी हैं कन्या मार दो। ****** चाहे न डालें गले में गंगाजल चाहिए वही। ****** कहाँ तक न खोजा  कुल...
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बुधवार, 9 अप्रैल 2014

जीवन : पानी का बुलबुला !

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जीवन एक बुलबुला है , जैसे बारिश की बूँदें   भरे हुए पानी में  अपने अस्तित्व को एक बुलबुला बनकर जीवित रखती हैं , उनके अंदर की प्राणवा...
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सोमवार, 24 मार्च 2014

वे यकीन नहीं करते !

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                                  कलम का एक लम्बा विराम और फिर उठ कर चलने का प्रवाह सब अपना ही मन है।  कहीं बिंधी रही जिंदगी किसी  काम में ...
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रविवार, 15 दिसंबर 2013

ख़ामोशी !

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ख़ामोशी  कुछ नहीं कहती है , मुखर नहीं होती , फिर भी  किसी की ख़ामोशी  कितने अर्थ लिए  खुद एक कहानी  अपने में समेटे रहती है।  किसी की ...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
कानपुर , UP, India
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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