जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.
शनिवार, 22 दिसंबर 2012
शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012
सोमवार, 3 दिसंबर 2012
गुरुवार, 22 नवंबर 2012
शनिवार, 3 नवंबर 2012
शनिवार, 27 अक्टूबर 2012