जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.
गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012
रविवार, 29 जनवरी 2012
सोमवार, 16 जनवरी 2012
सोमवार, 9 जनवरी 2012
शनिवार, 7 जनवरी 2012
सोमवार, 2 जनवरी 2012