जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.
मंगलवार, 20 सितंबर 2011
सोमवार, 19 सितंबर 2011
शनिवार, 10 सितंबर 2011
बुधवार, 7 सितंबर 2011
शनिवार, 20 अगस्त 2011
बुधवार, 17 अगस्त 2011