जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.
सोमवार, 17 जनवरी 2011
शुक्रवार, 7 जनवरी 2011
शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010
बुधवार, 8 दिसंबर 2010
सोमवार, 6 दिसंबर 2010