hindigen

जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

माटी के दिए !

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कुम्हार की चाक पर ढलते हुए दिए आपस में कुछ इस तरह बात कर रहे थे- 'भाई आज हम साथ साथ ढल रहे हैं. पता नहीं कल बिखर कर कहाँ ...
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सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

ये कैसे रिश्ते?

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                    पता नहीं क्यों? कुछ खबरें और कुछ घटनाएँ  कुछ इस तरह से दिल में उतर जाती हैं की रोक नहीं पाती खुद को और न ये कलम रुकने क...
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सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

सुकून की दौलत !

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अरे मूर्ख इंसान , तू भूला है  कहाँ? जिन्दगी को अपनी दौलत और ताकत की नुमाइश बनाये फिरता है . इससे खरीदी इज्जत तो कभी ठहरती ही न...
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शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

नए रिश्तों की गहराई !

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अब ये कैसा मानव हो गया है?  कुछ भी शेष नहीं, जन्म  प्रदत्त  रक्त  सम्बन्ध  तार तार हो  रहे हैं. न मूल्य, न मान्यताएँ  और न धारणा...
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मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

सपनों में घरौंदा !

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हर रात को नींद में डूबकर  सपनों में घरौंदा बनाया हमने आती रही आंधियां  रोज रोज  उथल पुथल  ही तो  कर गयीं बिखरे ख़्वाबों को फिर ...
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रविवार, 3 अक्टूबर 2010

मेरी 100वी कविता !

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  पाँव रखे जिस धरती पर परिचय मांग रही थी लिखित कागजों में जाति  , धर्म, कर्म औ' देश का प्रमाण देना जरूरी था. फिर दिया भी कि...
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मंगलवार, 28 सितंबर 2010

इम्तिहान मेरे सब्र का !

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इम्तिहान मेरे सब्र का कुछ इस तरह तो मत लीजिये. फूल तो मांगे नहीं मैंने, काँटों की सजा तो मत दीजिये. हर गम कुबूल मैंने कर लिया,...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
कानपुर , UP, India
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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