hindigen

जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

इम्तिहान मेरे सब्र का !

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इम्तिहान मेरे सब्र का कुछ इस तरह तो मत लीजिये. फूल तो मांगे नहीं मैंने, काँटों की सजा तो मत दीजिये. हर गम कुबूल मैंने कर लिया,...
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शनिवार, 25 सितंबर 2010

अफसोस !

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बहुत अपना समझ कर उन्हें , मैंने दिल  खोल कर अपना धर  दिया. जो आये थे कभी हमदर्द बनाकर, बाहर जाकर उन्होंने ही बदनाम कर दिया. किस...
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सोमवार, 20 सितंबर 2010

ब्लॉग्गिंग के दो बरस ...........

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                      आज मेरे ब्लॉग बनाये हुए दो बरस बीत गए. सफर बहुत ही अच्छा रहा. ये मेरा ब्लॉग ही पहला ब्लॉग थाजिसका नामकारण मैंने अप...
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मंगलवार, 14 सितंबर 2010

मानवता शेष रहेगी!

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हाँ ,  मैं मानव हूँ, जुड़ा रहा जीवन भर   मानवीय मूल्यों से। कभी बंधा नहीं, अपने और परायों की सीमा में जो हाथ बढ़े  बढ़ कर थाम लिया...
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सोमवार, 13 सितंबर 2010

हिंदी दिवस पर !

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हिंद की शोभा है वो माथे की बिंदी बनी, कलेवर है इस देश का  इस तरह हिंदी बनी. अभिव्यक्ति का सहज माध्यम सारे देश ने बनाया इसे अब, हिंदी दिवस क...
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शनिवार, 4 सितंबर 2010

गुरुवर तुम्हें नमन !

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रिश्तों की एक  डोर बंधी है, गुरुवर उसमें बांधा तुमने, पथरीली राहों पर भटकी, थाम लिया था गुरुवर तुमने, ठोकर खाकर थकी मैं जब भी, हाथ फिरा...
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बुधवार, 1 सितंबर 2010

फिर से पड़ेगा आना !

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कान्हा रे कान्हा, तुम्हें फिर पड़ेगा आना. महाभारत सा संघर्ष हर दिशा में छिड़ा है सत औ' असत की लड़ाई में सत पर असत अब भारी है. फिर ...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
कानपुर , UP, India
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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