hindigen

जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

कलम का धर्म !

›
कलम कब रूकती है वह तो कुछ न कुछ रचेगी ही, किसी का दर्द लिखा तो खुद ही रो दी. बयान खुशियाँ  की तो उसके संग खुद भी मुस्करा ली. प्रकृति के संग ...
4 टिप्‍पणियां:
मंगलवार, 27 जुलाई 2010

मृग मरीचिका !

›
मृग मरीचिका सा बाहर जाने का सुख रंगीन सपनों की चमक स्वर्ग सा जीवन जीने की ललक उड़ा ले गयी उसे दूर बहुत दूर अपनी जमीन से. फिर दूसरी धर...
10 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 26 जुलाई 2010

घर के चिराग !

›
एक एक करके चिराग घरों के गुल क्यों हो रहे हैं? कभी इस घर में रुदन, कभी उस घर में चीत्कार क्या मातम इसी तरह से रोज पसरता  ही रहेगा. एक दिन ...
4 टिप्‍पणियां:
रविवार, 25 जुलाई 2010

गुजरा हुआ बचपन !

›
आज पता नहीं क्यों? भूला हुआ बचपन फिर याद आया है. तौल रही हूँ तब से अब तक जिए हुए पलों को क्या खोया क्या पाया है? वो  छोटे छोटे सपने ...
7 टिप्‍पणियां:
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

उँगलियों पर छाले!

›
मुझे दुहाई मत दो उन रिश्तों की जिन्हें ज़माने ने अपना औ' सबसे अपना कहा है, उनके दिए ज़ख्म पैबस्त हैं सीने में, गिनने बैठ जाऊं तो उँगलियों ...
15 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 12 जुलाई 2010

अवशेष ही अवशेष !

›
बहुत दिनों से खुले अध्याय का आज पटाक्षेप हो गया. सब कुछ ख़त्म एक लम्बे सफर की दास्ताँ जो खुद बा खुद लिखी जा रही थी फिर अचानक एक आई ऐस...
6 टिप्‍पणियां:
रविवार, 11 जुलाई 2010

कैसे बचाएं बेटी तुम्हें!

›
कहाँ से लायें हम संगीनों के साए जिनके तले महफूज़ रखें अपनी बेटियों को. पहले तो जन्म से पहले ही घर वालों की नज़रों से दूर कोख में पालना...
9 टिप्‍पणियां:
‹
›
मुख्यपृष्ठ
वेब वर्शन देखें

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
रेखा श्रीवास्तव
कानपुर , UP, India
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें
Blogger द्वारा संचालित.