जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.
मंगलवार, 29 जून 2010
मेरा मीत कहाँ रे !
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9 टिप्पणियां:
बुधवार, 23 जून 2010
गुरुवार, 17 जून 2010
शुक्रवार, 11 जून 2010
सोमवार, 7 जून 2010
बुधवार, 2 जून 2010