hindigen

जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.

मंगलवार, 29 जून 2010

मेरा मीत कहाँ रे !

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बुधवार, 23 जून 2010

कितना विरोधाभास !

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बादलों की गर्जन बारिश की टप टप जंगल में नाचते मोर गलियाँ भरी पानी में भीगते  बच्चे मचाते शोर, किसानों  के चेहरे पर खिल रही हैं मुस्कान,  प्य...
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गुरुवार, 17 जून 2010

जीवन वृक्ष !

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नव पल्लव सा अद्भुत बचपन और चले दो चार कदम तो डाल पकी औ' बन गया पौधा, अपने पैरों खड़ा हुआ फिर   तो जीवन के चरणों सा नित नव विकसित किशोर, य...
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शुक्रवार, 11 जून 2010

एक अंतहीन इन्तजार...........!

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इन्तजार किसी अच्छे पल का कितना मुश्किल होता है? लगता है ठहर गयी काल की गति सुइंयाँ रुक गयीं सूरज और चाँद भी रुक गए हैं किसी इन्तजार ...
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सोमवार, 7 जून 2010

कैसी ये ख़ामोशी ?

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आजकल खामोश क्यों? कलम तेरी, क्या जज्बा संघर्ष का कुछ डिगने लगा है? या फिर अपनी लड़ाई में बढ़ते कदमों के नीचे बिछाए गए  कुछ काँटों की चुभन ड...
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बुधवार, 2 जून 2010

लिखा नहीं जाता !

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गीत और ग़ज़ल लिखे नहीं जाते लिख जाते हैं, कौन सा पल,  कौन का निमिष , मन के दर्पण पर छोड़ दे एक लीक और मन भावों की लड़ियाँ,  अक्षरों क...
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शनिवार, 29 मई 2010

ये हादसों की इमारत !

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ये जिन्दगी हादसों की इमारत है, जिसकी एक एक ईंट के  तले दबे इस जिन्दगी के कुछ न भूलने वाले  हादसे ही तो हैं. इसको आकार देने में कभी मन...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
कानपुर , UP, India
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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