hindigen

जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

वो कहाँ खो गया?

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बचपन में जो था  अब वो कहाँ? न  जाने वो कहाँ खो गया? ये सवाल उठा मन में और फिर  वो याद आया - घनी अमराइयों में पेड़ों के झुरमुट कटती थी दुपहर न...
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शनिवार, 24 अप्रैल 2010

कल और आज !

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छत कि मुंडेर पर बैठी नीचे लगे वृक्षों को  देखकर ठंडक का अहसास ले रही थी. फिर नजर पड़ी  शाखों के बीच  घोंसले में बैठे पक्षियों के नवजात शिश...
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शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

संवेगों को लगाम दो!

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क्यों भटक रही है? ये नयी पीढ़ी, न जमीं का अहसास  न आसमां का अंदाज  पैरों के तले  जमीं का अंदाज जो देखा  खिसकी नहीं है, बस खिसकने के ...
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शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

आतंकवाद कहाँ नहीं है?

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हर किसी अप्रिय  घटना के घटित होने पर, हम कोसते हैं आतंकियों को. गालियाँ हम क्यों देते हैं? जिनको हमने देखा ही  नहीं. आतंकवाद के नाम पर चंद ...
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बुधवार, 7 अप्रैल 2010

तिरंगे में लिपटे शवों को सलाम!

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तिरंगे में लिपटे  इन वीरों को सलाम.  क्या इस नमन तक ही  हमारे कर्तव्यों की है इति श्री. फिर पढेंगे कोई दूसरी खबर  पर उस खबर के पीछे क्या बचा...
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बुधवार, 24 मार्च 2010

ये अश्क दरिया है !

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वो कला दीर्घा स्कूल के बच्चों की  मन मोहक तस्वीरें बाल मन, कच्चे भाव फिर भी  बहुत बारीकी से उकेरा था. अपनी कल्पनाओं के  अपनी संवेदनाओ...
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मंगलवार, 23 मार्च 2010

सवाल गुरुओं से !

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  बहुत साल पहले जब ये सब नहीं हुआ था, होता तब भी था , किन्तु परदे में छुपा था. मेरा मन तब भी इनसे खफा था. वह प्रवचन दे रहा था भीड़ से भरे पं...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
कानपुर , UP, India
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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