जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.
बुधवार, 30 दिसंबर 2009
मंगलवार, 29 दिसंबर 2009
सोमवार, 14 दिसंबर 2009
गुरुवार, 10 दिसंबर 2009
गुरुवार, 3 दिसंबर 2009
रविवार, 29 नवंबर 2009